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ठहर कर देखना पड़ता है कितनी दूर है मंजिल इस ठहराव को बुजदिल हमारी हार कहते हैं। महरूम-ए-हकीकत हैं साहिल के तमाशाई हम डूब कर समझे हैं दरियाव की गहराई।