lockdown ke lekh

चिलचिलाती धूप में सड़कों कराह रहे दर्द को देखकर भी मैं उतना दुखी नहीं हूं जितना ये देखकर कि सभी तथाकथित हिन्दूवादियों को इस समय गरीब, मजदूर, कामगारों को छोड़कर बाकी दुनिया के सारे मुद्दे दिख रहे हैं।

नहीं। ये लोग अंधे नहीं हैं। सब देख सुन रहे हैं। लेकिन बोलेंगे नहीं। न तो हिन्दूवादी चैनल समाचार दिखायेगा और न सोशल मीडिया के तथाकथित हिन्दूवादी वैरियर इनका मुद्दा उठायेगा। ये वही निष्ठुरता और कायरता है जो किसी साधु की लिंचिंग पर किसी कम्युनिस्ट के मन में जागती है।

भारत में प्रचलित दो प्रमुख विचारधाराओं का यह विरोधाभाष है। ये लोग सत्ताधीश देखकर समर्थन या विरोध तय करते हैं। यह घृणित और अमानवीय है। कोई मनुष्य ऐसा कैसे हो सकता है? अरे मनुष्य के नाते न सही हिन्दू होने के नाते ही उनसे सहानुभूति दिखा दो। क्योंकि  शासन की सनक के कारण जो लोग सड़कों पर मारे मारे फिर रहे हैं उसमें 90 प्रतिशत से ज्यादा हिन्दू ही हैं।
आम आदमी के दुख दर्द के प्रति राष्ट्रवादियों की गहरी चुप्पी ने मुंझे अंदर तक झकझोड़ कर रख दिया है। मैं उम्मीद कर रहा था कि कुछ लोग तो लिखेंगे। लेकिन मैंने अब तक किसी घोषित राष्ट्रवादी के वॉल पर सड़क पर घिसटते लोगों के प्रति सहानुभूति की एक पोस्ट न देखी। क्या राष्ट्रवाद इतना अधिक जन विरोधी होता है कि जीते जागते व्यक्ति की संवेदना छीन ले? अगर हां, तो ये बहुत घातक है।
Rajnish mishra

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